सुनो तुम, बस…

एक बात कहना चाहता हूँ तुमसे
या शायद कई सारी बातें,
और कहना नहीं,
करना चाहता हूँ ये बातें
तुम्हारे साथ
कहीं आराम से बैठ कर,
गीली घास पर एकांत में
या शायद किसी कैंटीन की भीड़ के बीचोंबीच…

पर एक परेशानी भी तो है,
कि सिर्फ मेरे चाहने से बातें हों, ये नहीं चाहता।
मैं तो चाहता हूँ तुम भी उतनी ही शिद्दत से बातें करना चाहो,
मैं तो चाहता हूँ तुम भी गीली घास पर बैठना चाहो
या किसी कैंटीन की भीड़ में ही शुरू कर दो बातें करना,
ऐसे जैसे हमलोग भूल गए हों कि आसपास लोग भी हैं!
मैं तो ये भी चाहता हूँ कि तुम ही बोलती जाओ बस
और मैं तुम्हें सुनने का नाटक करते हुए
देखता जाऊँ बस एकटक
तुम्हारी उठती-गिरती पलकों को,
तुम्हारे हिलते-डुलते होंठों को,
जो कभी तो आभास कराते हों जैसे तुम बेहद ख़ुश हो
मगर अगले ही पल तुम्हें गुस्से में लाल बताते हों…
अरे, मैं भटक गया!
अच्छा सुनो!

देखो मैं बस ये कहना चाहता हूँ कि
वो जो लड़का है न जो पसंद है तुम्हें,
(बेहद पसंद है शायद)
वो लड़का बेहद ख़ुशनसीब भी है।
हाँ, मुझे पता है तुम मानोगी नहीं ये बात।
इसीलिए कह भी पाऊँ मैं शायद
क्यूँकि अक्सर ही तुम मेरी बातें नहीं मानती,
सिरे से नकार देती हो,
और मैं भी चुप हो जाता हूँ
क्यूँकि मैं शायद चाहता हूँ कि तुम नकार ही दो,
मत मानो ऐसी बातें जिनमें तुम्हारा खूबसूरत सच बयान हो…

हाँ वो लड़का! मैं भटक बहुत जाता हूँ यार!
वो शर्मीला तो है पर पता नहीं क्यूँ, मुझे भी पसंद है थोड़ा सा,
मैं कहना ये चाहता हूँ कि उसके साथ जब भी
बैठ के बातें करोगी न तुम
गीली घास पर या किसी कैंटीन की भीड़ के बीचोंबीच
तो एक बार उसे देखना!
जैसे मैं देखता हूँ न, वैसे ही!
देखना कैसे उसकी पलकें उठती हैं, गिरती हैं
देखना कैसे उसके होंठ हिलते हैं
देखना कैसे मुस्कुराता है वो बोलते हुए
और उसकी आँखें पढ़ना!
बोल के जब तुम चुप हो जाती हो ना
तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखें कहती रहती हैं फिर भी!
यक़ीन है मुझे, उसकी आँखें भी चुप नहीं होंगी,
पढ़ना उनमें, जो कहा नहीं जा सकता है कभी…
पढ़ा तो मैंने भी था ही तुम्हारी आँखों को
मगर शायद…

ख़ैर छोड़ो मैं फिर भटक जाऊँगा कहीं!
बस यही सब बातें करना चाहता हूँ तुमसे
गीली घास पर बैठ कर
या किसी कैंटीन की
भीड़ के बीचोंबीच,
मगर मुझे पता भी है
कि अब नहीं है मुमकिन
तुम्हारे लिए कभी
मुझसे ऐसी बातें कर पाना।
हाँ मगर इक उम्मीद है,
छोटी सही, पर है ज़रूर
कि कभी टकरा जाएं हम दोनों
किसी ऐसी ही खुशनुमा जगह पर,
तो दो-चार बातें तो हो ही जाएंगी कम से कम…

तुम

तुम…
वाकई परी लगती हो
जब भी शून्य में देख के मुस्कुराती हो धीमे से,
मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है तुम्हें उस वक़्त टोकना
फिर भी पूछ लेता हूँ, पता है क्यूँ?

क्यूँकि तब जो तुम बोलती हो न,
तुम्हारे चेहरे पर एक मुस्कान होती है,
अजीब सी ज़रूर होती है
लेकिन उसमें ऐसा कुछ होता है
जो दुनिया में और कहीं है ही नहीं!

पता नहीं शायद कोई यक़ीन,
या फिर कोई सवाल, या जवाब
वो जो कुछ भी होता है
तुमको तुम वही बनाता है
मैं बस इतना ही जानता हूँ…

ज़िन्दगी

कुछ लोग रुके, चलते गये कुछ, मगर
थमी रही ज़िन्दगी!

कारवाँ गुज़रते चले गये, ख़ाक सी मगर
बनी रही ज़िन्दगी!

थी आँसुओं के बीच हर पल, बर्फ़ सी मगर
जमी रही ज़िन्दगी!

अब नहीं है कल जो भी था,
इक उम्मीद सी है मगर

तमाम ख़ामोशियों में ज़िन्दा रहेगी
ख़ामोशियों में दफ़्न मेरी ज़िन्दगी!

मैंने देखा है इतना कुछ!

मैंने देखा है
खिले हुए फूलों का
एक झटके में टूट जाना

मैंने देखा है
लहराती पतंगों का
एक झटके में कट जाना

मैंने देखा है
उमड़ती हुई लहरों का
एक झटके में थम जाना

तो तुम मान लो
हिम्मत हो न हो
आदत है मुझको
तमाम खूबसूरत चीज़ों को
एक पल में बिखरते देखने की

ये सारी दुनिया ख़त्म भी हो जाए,
मैं देख लूँगा…